Inspiring stories of Swami Vivekananda / स्वामी विवेकानंद की प्रेरक कहानियाँ

 प्रेरक कहानी -1.स्वामी विवेकानंद और माँ 

स्वामी विवेकानंद एक बार किसी काम से america गये हुए थे, और वहां उनके पास एक अंग्रेज़ आया और उसने स्वामी जी से एक सवाल पूछा कि स्वामी जी आपके india में “माँ” को सबसे ऊँचा दर्जा क्यों दिया जाता है, क्यों लोग पहले माँ को पूजते और बाद में भगवान को पूजते हैं। 

स्वामी विवेकानंद उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखे और उस अंग्रेज से कहा कि वहां पास में एक पत्थर पड़ा हुआ है उसे उठा लाओ।

अंग्रेज़ पत्थर लेकर आ गया, अब स्वामी जी ने उससे कहा कि इस पत्थर को एक कपड़े में लपेटकर अपने कमर से बाँध लो। 


कमर से पत्थर बाँधने के बाद स्वामी जी ने उस अंग्रेज़ से कहा कि अब तुम जाओ और 2 घंटे बाद आना फिर में तुम्हारे सवालों के जवाब दूंगा लेकिन एक बात का ध्यान रहे कि तुम अपनी कमर से इस कपड़े को खोलना नहीं।

अंग्रेज़ वहां से चला गया, पत्थर के वजन के कारण उसे चलने फिरने में बहुत तकलीफ हो रही थी और 1 घंटे पहले ही स्वामी जी के पास पहुँच गया और उनसे कहने लगा कि रहने दीजिये मुझे आपसे कोई सवाल नहीं पूछनी, में अब ये पत्थर हटा रहा हूँ अपनी कमर से।

स्वामी विवेकानंद जी ने उस अंग्रेज़ की तरफ मुस्कुराते हुए देखकर बोले – इसीलिये हमारे हिंदुस्तान में माँ को भगवान से भी ऊँचा दर्जा दिया जाता है।

तुम इस पत्थर को अपने कमर से एक घंटे भी बाँध कर नहीं रख सके और माँ हमें पूरे 9 महीने अपने पेट में रखती है। बड़ी से बड़ी आंधी-तूफान क्यों न आ जाये फिर भी हमें वो किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचने देती है।

शिक्षा:-

जिंदगी में बड़ी से बड़ी मुश्किल की घड़ी क्यों न आ जाये लेकिन कभी भी अपने मम्मी-पापा का साथ मत छोड़ना क्योँकि जब आप छोटे थे तब उन्होंने एक पल के लिये भी आपका हाथ नहीं छोड़ा था।


              प्रेरक कहानी - 2.स्वामी विवेकानंद और कामयाबी 

एक बार स्वामी जी के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला। 

"महाराज! मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूँ मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया। भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।"

स्वामी जी उस व्यक्ति की समस्या को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा- “तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।“

उस व्यक्ति ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी खासी सैर करा कर जब वो व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहुँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था, जबकि कुत्ता हाँफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

स्वामी जी ने उससे पूछा - "कि ये कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया? जबकि तुम तो अभी भी साफ सुथरे और बिना थके दिख रहे हो।"

व्यक्ति ने कहा-" मैं सीधा अपने रास्ते पे चल रहा था, परन्तु  ये कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसीलिए ये थक गया है।"

स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा-"यही तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आस पास ही है वो ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पे जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले। "

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धन्यवाद !!!

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